क्यूँ ख्वाहिशें उभरती है और छूते ही टूट जाती है?
ख्वाहिशें भी कितनी मासूम होती है ,
पूरा होने की खुशी में ये ही भूल जाती है की आँख खुलते ही हकीकत का सामना हो जाएगा !
अपने आप को सपने में देख ऐसे खुश हो जाती है जैसे कोई बड़े पर्दे पर इसकी अभिनय किए चलचित्र चल रही हो!
इसकी इस मासूमियत पर तरस आ जाता है , की उसने तो सिर्फ पूरा होना ही सीखा है , टूटने पर कैसे प्रतिक्रिया की जाती है , यही नहीं मालूम!! @surbhisays