अनंत है यह आसमाँ,
किधर दर्द साँझा करूँ?
हुई है नम आँखों की शीत प्रवाह,
बता किधर इस विरह की बौछार करूँ?
हुआ है घरौंदा तबाह मेरा ,
“तपिश की धारा” हृदय तेरा ,
बता इस नाइंसाफी का मैं क्या करूँ? @surbhisays

मुलाकातें तो बहुत हुई है अधूरेपन से ,

लेकिन आज यह इतने पास ना जाने क्यूँ है !

एक अजीब सी उदासी ,

चेहरे पर ठहरी , पता नहीं क्यूँ है !

लोगों से दूर , सुनसान ,

फिर भी दिल में घमासान ,

ना जाने क्यूँ है !

बचपन का अकेलापन आज

अभी तक इसका साथ पता नहीं क्यूँ है !

डरी , घबराई ,सहमी

आज भी नज़रअंदाजी , ना जाने क्यूँ है !

टूटा बिखरा पड़ा आत्मविश्वास , पता नहीं क्यूँ है!

चुप , शांत , ये खामोशी ना जाने क्यूँ है ,

अगर है भी तो ,

इसे चिल्ला- चिल्ला के मदद ना मांग पाना

पता नहीं क्यूँ है। @surbhisays

To a heart racing ,

are you still into trading ?

Trading of those bloomy sentiments into attachments ?

And profiting it into detachments ?

From a broke soul @surbhisays

And the plateaus of sigh ,

are growing high ,

With the meadows of happiness ,

thriving lifeless !

The dooming present ,

and persistant accentuating repent ,

strangulating the emotions !

The feels on edge ,

with no one to even pledge ,

Here’s the broke soul ,

summoning GOD to patch this hole ! @surbhisays

एक तरफ तू है ,

एक तरफ मै हूँ ,

एक ही दीवार के नीचे ,

सामने पड़ा गुलदस्ता

बेज़ारी का ,

सँवार रहा गुलदान ,

दिया है तूने हर बार ।

सींच रहे जबरन ,

अखिर दिया तो तूने ही है

तुम्हारी आदत

और मैं सिर्फ कहावत

खिले तन्हाई के गुल

जिधर भंवरे की गुनगुनाहट

देख तेरी मुस्कराहट ,

और मेरे दिल की घबराहट ,

कि क्यूँ ?

एक तरफ़ा रिश्ता प्रश्न चिन्ह लगा जाता ,

कि बिना आग उम्मीद इसे सुलगा जाता । @surbhisays



फिर से वो जीत गये और मैं हार गयी !

कितनी खुशी की बात है ना तेरे लिए जिंदगी

देख ,

वो बचपन का अकेलापन , आज हमराह बन गया !

पस्त पड़ा आत्मविश्वास ,

धड़कने बदहवास ,

यूँ ज़ुबान मे नमकीन स्पर्श ,

धुंधला संदर्श

मेरी औकात बता गया !

सुन लो ऐ हमराह ,

अकेला होना अधूरा नहीं ,

परछाई का साथ ,बुरा नहीं

ये जीवन की सूनी पगडंडी

अनजान है ,

कि हर मोड़ की खंडी

को छांट

डर बेजान है। @surbhisays

हर साल  हर नर्म दास्तान ,

लिपटा है यादों में हर वो इंसान ,

जो छोड़ चला जाता , जज्बातों का चीड़ फाड़ ।

उम्मीदों के बावले इन्तेज़ार की औकात बता जाता ,
की क़र्ज़ हो तुम , मजबूरी चुकाता ।

देखो वो पड़े है मेरे नोचे हुए उम्मीदों के पंख ,
सियाही में डूबा हुआ ,
लिख रहे है दिल का छुआ…

इस उम्मीद में कि

पंख में फँसे बोझ कम हो जाएंगे
हिम्मत के धागे इसे वापस सिल पाएंगे। @surbhisays

वादे थे सबके साथ ना छोड़ने के ,

देखो आज आँसू ही हाल पूछते है ,

गूंजती धड़कने , सिसकती साँसें ,

देखो आज आँसू ही हाल पूछते है ,

जिसे चाहो , वही दूर हो जाता , और ऐसे मेरा आत्मविश्वास भी मुझसे कह जाता कि ,

“देखो आज आँसू ही हाल पूछते है , “

सवाल है दिल में

कि क्या खुशियाँ भी रहती नसीब के बिल में !

नम रहता सिरहाना मेरा ,

अंधेरे की बात है ,अंधेरे तक रहने देना ,

टूट चुके है हर ज़ज्बात मेरे ,

लेकिन हर बार

इन कांपते हाथों को थाम लेते

बुढ़ी माँ के प्यार के बसेरे । @surbhisays

इतना जुनूनी था प्यार मेरा कि ,

वफ़ादारी को गोद में पकड़े

चलते रहे और तोलते रहे ,

ताकि उन्हें ढूँढ , दिखा सके और पूछ सके कि

“यह वज़नी है या उनकी खूबसूरती !” @surbhisays

तैर रहे है सपने सुहाने , हवा में ,

किस्मत कहती पकड़ सको तो जाने !

बिखरते , टूटते , चारों ओर ,

आ गए नजरों की ओर ,

चुभा ऐसा , कोना-कोना

अंधकार जागा , आधा-पौना

अंधी आँखें , टूटा दिल ,

हँसते लोग , वाह! वाह ! इतने काबिल !

आत्मविश्वास दाव पर लगा है ,

किस्मत का ऐलान , ” यही तेरी सज़ा है ! “

अरे! गलती बिना सज़ा कैसे ?

सपने देखा… सब के जैसे !

बोली किस्मत,

“आयेगा वही पास जो सच्चा चाहता तेरा साथ,

समुंदर की नमकीन उम्मीदें , ना देती गिरते हलक को हाथ । ” @surbhisays