ईमानदारी का ताज़ पहने ,

बिन गलतियों के धिक्कार सहते ,

मौन हो गई हूँ |

जटिल है यह जीवन,

जहाँ हर इंसान   ,

चुभा रहा कठोरता , आजीवन |

फिर भी,

मैदान-ए-जंग में निकल तो पड़े है ,

ना कोई सहारा, ना कोई संगी है।

बस तेरी ही आस है,  हे ज़िंदगी ।

नयी राह और अकेलापन, यही तेरा उसूल है  |@surbhisays

बड़ी हलचल है मंज़िलों में, 
जैसे खो गया है कारवाँ
वो चकाचौंध होते साहिलों में
घुटती कला ,
जैसे एक से होते हज़ारवाँ। @surbhisays