ईमानदारी का ताज़ पहने ,

बिन गलतियों के धिक्कार सहते ,

मौन हो गई हूँ |

जटिल है यह जीवन,

जहाँ हर इंसान   ,

चुभा रहा कठोरता , आजीवन |

फिर भी,

मैदान-ए-जंग में निकल तो पड़े है ,

ना कोई सहारा, ना कोई संगी है।

बस तेरी ही आस है,  हे ज़िंदगी ।

नयी राह और अकेलापन, यही तेरा उसूल है  |@surbhisays

इन्तेज़ार है की कोई इस वास्तविकता को कबूल करे ,

की दिल की सुंदरता देखना प्रकृति का असूल है ,

चेहरा और शरीर तो बस जल्दबाजी का चारा है ,

बदलते ही सबने इसको नकारा है ,

दिल की सुंदरता किसी के मोहताज नहीं ,

सदेव एक जैसा रहना , इस पर उंगली उठाना , ऐसे किसी की औकात नहीं । @surbhisays