अनंत है यह आसमाँ,
किधर दर्द साँझा करूँ?
हुई है नम आँखों की शीत प्रवाह,
बता किधर इस विरह की बौछार करूँ?
हुआ है घरौंदा तबाह मेरा ,
“तपिश की धारा” हृदय तेरा ,
बता इस नाइंसाफी का मैं क्या करूँ? @surbhisays
habit
एक तरफ तू है ,
एक तरफ मै हूँ ,
एक ही दीवार के नीचे ,
सामने पड़ा गुलदस्ता
बेज़ारी का ,
सँवार रहा गुलदान ,
दिया है तूने हर बार ।
सींच रहे जबरन ,
अखिर दिया तो तूने ही है
तुम्हारी आदत
और मैं सिर्फ कहावत
खिले तन्हाई के गुल
जिधर भंवरे की गुनगुनाहट
देख तेरी मुस्कराहट ,
और मेरे दिल की घबराहट ,
कि क्यूँ ?
एक तरफ़ा रिश्ता प्रश्न चिन्ह लगा जाता ,
कि बिना आग उम्मीद इसे सुलगा जाता । @surbhisays
हर साल हर नर्म दास्तान ,
लिपटा है यादों में हर वो इंसान ,
जो छोड़ चला जाता , जज्बातों का चीड़ फाड़ ।
उम्मीदों के बावले इन्तेज़ार की औकात बता जाता ,
की क़र्ज़ हो तुम , मजबूरी चुकाता ।
देखो वो पड़े है मेरे नोचे हुए उम्मीदों के पंख ,
सियाही में डूबा हुआ ,
लिख रहे है दिल का छुआ…
इस उम्मीद में कि
पंख में फँसे बोझ कम हो जाएंगे
हिम्मत के धागे इसे वापस सिल पाएंगे। @surbhisays
यूँ ना हवाले करो अपनी नजरों की गुफ़्तगू को ,
कि इल्ज़ाम हम पे लग जाए इश्क हो जाने का ,
घूँघट ओढ़े मुस्कान को ,
ऐसे न देखो ,
कि इल्ज़ाम हम पे लग जाए जज्बातों के ऐलान हो जाने का ,
लोग जो भी कहे , लेकिन
तेरे इस तीरंदाजी के खेल में जीतना ,
पता नहीं क्यूँ नजारा धुँधला कर देता है ,
इज़हार नहीं आता , बस कुछ गुमसुम एहसास है ,
एक तरफा ज़ज्बात है , लेकिन
इल्ज़ाम लग जाने का डर , पता नहीं क्यूँ अच्छा लगता है। @surbhisays
क्या फायदा उम्मीद रखने से ,
जिधर सिर्फ शर्तें है , बनावटी से !
आँखें पस्त पड़ गई है , आँसुओं के बहाव से ,
तरस भी नहीं आता देख , इसके गिरते भाव से !
हर कोशिशें छोटी – छोटी ,
उम्मीदें मोटी – मोटी ,
कि शायद रिझा सके ,
सारी शर्तें सुलझा सके ,
लेकिन नजरबंदी है
मेरी कोशिशों से ,
एहसानमंदी है
निरंतर सिफारिशों से !
मना लिया अपने को कि ,
“दिल टूटा है , समय जोड़ देगा ,
ज़ज्बात लूटा है , आत्मविश्वास की होड़ , उसे पिरोह देगा ।”
कोशिशों से भागना बुजदिली है ,
यह दुनिया है , इधर हर भावनायें दलदली है ,
इसमें जबतक गिरेंगे नहीं तो निकलना कैसे सीखेंगे ,
एक बार हिम्मत करके निकल गए , तो अगली बार परखना कैसे समझेंगे । @surbhisays
शौक रखते थे हम आँखों की सुंदरता देखना का ,
पलके झपकते ही इन्तेज़ार करते थे , चार होने की स्थिरता का !
आँखें कुछ तो कह रही थी , अंदर ही अंदर सह रही थी !
बेसब्री से इन्तेज़ार हो रहा था ,
“अनदेखी” औज़ार वार कर रहा था !
बिलख-बिलख कर रो रही थी ,
बस मेरी ही आँखें यह कोलाहल पढ़ रही थी !
हँस कर मैंने उसका मजाक उड़ाया ,
“ड्रामा” बोल मेरी आँख , इस दर्द को हवा में फूँक आया !
समय ने ऐसा पलटा खाया ,
जब खुद की भीगी आँखों को कोई समेटने ना आया !
शौकिया मिजाज़ मेरा चकनाचूर हो गया ,
अजीब था यह शौक जो दर्द सिर्फ मजाक में सुनता ही रह गया !
भर रहे इस “शौक” का जुर्माना अभी तक ,
दिल टूट गया , लोगों ने छोड़ दिया , भरेंगे ऐसा हर्जाना कब तक !!
बहुत दर्द देती है ये आँखें ,
काश ! लफ़्ज़ों द्वारा बोल सकती , प्रायश्चित की दुआ , दिन और रातें ! @surbhisays
आदतें बेईमान है ,
कभी जिद्दी कभी शांत , बड़ी ही नादान है ,
कसमें, वादे तोड़ना इसका मान है ,
हिचकोले खाते प्यार को पिरोह के रखना इसका अभिमान है ,
अपनी लत में फ़साना, अकड़ में चलने वाले ये यजमान है ,
आदतें बेईमान है ,
कभी जिद्दी कभी शांत , बड़ी ही नादान है । @surbhisays