अनंत है यह आसमाँ,
किधर दर्द साँझा करूँ?
हुई है नम आँखों की शीत प्रवाह,
बता किधर इस विरह की बौछार करूँ?
हुआ है घरौंदा तबाह मेरा ,
“तपिश की धारा” हृदय तेरा ,
बता इस नाइंसाफी का मैं क्या करूँ? @surbhisays

संघर्षो में गोते खाती जिंदगी,

संतुलन बना रही है ,

जिद्दी हठी जूनूनी मेहनत ,

हर डर काट रही है ,

यह गुनगुनी धूप सेकती लहरें

विश्वास दिला रही है , कि

तपिश ही है जो

साँस चला रही है । @surbhisays

क्यूँकी वो कहते है ना कि

कुर्बानी ऐसी करो की

पीछे मुड़ने में दर्द ना हो ,

यूँ उन जानी पहचानी जगहों के गुजरने पर

धड़कने सर्द ना हो ,

दिखाई देती है ना वो गुफ़्तगू की झलकियाँ ,

आँसुओं से ऐसे मुक़म्मल करो की

नजरे साफ , इज़हार-ए-मोहब्बत मे इसबार

सुकून के पल ही पल हो। @surbhisays

To a heart racing ,

are you still into trading ?

Trading of those bloomy sentiments into attachments ?

And profiting it into detachments ?

From a broke soul @surbhisays

And the plateaus of sigh ,

are growing high ,

With the meadows of happiness ,

thriving lifeless !

The dooming present ,

and persistant accentuating repent ,

strangulating the emotions !

The feels on edge ,

with no one to even pledge ,

Here’s the broke soul ,

summoning GOD to patch this hole ! @surbhisays

एक तरफ तू है ,

एक तरफ मै हूँ ,

एक ही दीवार के नीचे ,

सामने पड़ा गुलदस्ता

बेज़ारी का ,

सँवार रहा गुलदान ,

दिया है तूने हर बार ।

सींच रहे जबरन ,

अखिर दिया तो तूने ही है

तुम्हारी आदत

और मैं सिर्फ कहावत

खिले तन्हाई के गुल

जिधर भंवरे की गुनगुनाहट

देख तेरी मुस्कराहट ,

और मेरे दिल की घबराहट ,

कि क्यूँ ?

एक तरफ़ा रिश्ता प्रश्न चिन्ह लगा जाता ,

कि बिना आग उम्मीद इसे सुलगा जाता । @surbhisays



फिर से वो जीत गये और मैं हार गयी !

कितनी खुशी की बात है ना तेरे लिए जिंदगी

देख ,

वो बचपन का अकेलापन , आज हमराह बन गया !

पस्त पड़ा आत्मविश्वास ,

धड़कने बदहवास ,

यूँ ज़ुबान मे नमकीन स्पर्श ,

धुंधला संदर्श

मेरी औकात बता गया !

सुन लो ऐ हमराह ,

अकेला होना अधूरा नहीं ,

परछाई का साथ ,बुरा नहीं

ये जीवन की सूनी पगडंडी

अनजान है ,

कि हर मोड़ की खंडी

को छांट

डर बेजान है। @surbhisays

हर साल  हर नर्म दास्तान ,

लिपटा है यादों में हर वो इंसान ,

जो छोड़ चला जाता , जज्बातों का चीड़ फाड़ ।

उम्मीदों के बावले इन्तेज़ार की औकात बता जाता ,
की क़र्ज़ हो तुम , मजबूरी चुकाता ।

देखो वो पड़े है मेरे नोचे हुए उम्मीदों के पंख ,
सियाही में डूबा हुआ ,
लिख रहे है दिल का छुआ…

इस उम्मीद में कि

पंख में फँसे बोझ कम हो जाएंगे
हिम्मत के धागे इसे वापस सिल पाएंगे। @surbhisays

आँखों के तिनके इतने मशगूल थे कि

नज़रें चार

मुसलसल अश्क के नमकीन एहसास ,

इन्तेज़ार मुकम्मल कर गया । @surbhisays

मुंतज़िर निगाहें , लेकिन

दिलों में अफवाहें , कि

मेरी दास्तान ए मोहब्बत ,

तेरे बेफिज़ुल मुड़ के देखने का अंजाम है। @surbhisays