आँखों के तिनके इतने मशगूल थे कि

नज़रें चार

मुसलसल अश्क के नमकीन एहसास ,

इन्तेज़ार मुकम्मल कर गया । @surbhisays

तैर रहे है सपने सुहाने , हवा में ,

किस्मत कहती पकड़ सको तो जाने !

बिखरते , टूटते , चारों ओर ,

आ गए नजरों की ओर ,

चुभा ऐसा , कोना-कोना

अंधकार जागा , आधा-पौना

अंधी आँखें , टूटा दिल ,

हँसते लोग , वाह! वाह ! इतने काबिल !

आत्मविश्वास दाव पर लगा है ,

किस्मत का ऐलान , ” यही तेरी सज़ा है ! “

अरे! गलती बिना सज़ा कैसे ?

सपने देखा… सब के जैसे !

बोली किस्मत,

“आयेगा वही पास जो सच्चा चाहता तेरा साथ,

समुंदर की नमकीन उम्मीदें , ना देती गिरते हलक को हाथ । ” @surbhisays

प्रश्नोत्तर

चंदनिया तेरी आँख मिचौली ,

छुप क्यूँ रहा है वैसे ?

बोला “मेरे माथे की मौलि ,

झुक कर देखा जाए कैसे? “

डर का पहरा तेरे चेहरे ,

“गिरता ताज ठिठोली के मोहरे !”

गिर जाने दे , दो पल के प्रशंसक ,

अल्हड़ मन , होता हिंसक !

“वो देख दाग ,हँसी का पात्र,

ताज पहन , छुपता राज़ “

हो जा तन्हा , बेहतर होगा ,

दाग तेरा ताज ,

तभी “सराहना” की परिभाषा होगा ! @surbhisays