अब कोई हैरत नहीं होती, जब किस्मत मुख मोड़ती है,
ज़िंदगी का बेरहम होना, तो अब रोज़ की बात लगती है।
उदास नहीं हूँ मैं , बस अंदर से टूट गई हूँ,
ज़िंदगी के इस अजीब खेल से, मैं बुरी तरह रूठ गई हूँ।
जी रही हूँ मैं , बस जैसे-तैसे,
‘काश ऐसा होता, काश वैसा होता’, बस इन्हीं पर सांसें बांट रही हूँ।
कोशिशें लाख कीं मैंने, पर झोली हमेशा खाली रही,
मांगा जो कुछ भी इस जहां से, मायूसी ही हाथ लगी।
शायद कतार में सबसे पीछे , खाड़ी, मेरा ही नाम है,
मुझ तक आते-आते, भगवान के पास खुशियों ही कमी हो जाती है, शायद यही मेरा अंजाम है,
सबको मिला सवेरा, शायद मेरे हिस्से ही बस शाम है। @surbhisays