हर साल हर नर्म दास्तान ,
लिपटा है यादों में हर वो इंसान ,
जो छोड़ चला जाता , जज्बातों का चीड़ फाड़ ।
उम्मीदों के बावले इन्तेज़ार की औकात बता जाता ,
की क़र्ज़ हो तुम , मजबूरी चुकाता ।
देखो वो पड़े है मेरे नोचे हुए उम्मीदों के पंख ,
सियाही में डूबा हुआ ,
लिख रहे है दिल का छुआ…
इस उम्मीद में कि
पंख में फँसे बोझ कम हो जाएंगे
हिम्मत के धागे इसे वापस सिल पाएंगे। @surbhisays