हर साल  हर नर्म दास्तान ,

लिपटा है यादों में हर वो इंसान ,

जो छोड़ चला जाता , जज्बातों का चीड़ फाड़ ।

उम्मीदों के बावले इन्तेज़ार की औकात बता जाता ,
की क़र्ज़ हो तुम , मजबूरी चुकाता ।

देखो वो पड़े है मेरे नोचे हुए उम्मीदों के पंख ,
सियाही में डूबा हुआ ,
लिख रहे है दिल का छुआ…

इस उम्मीद में कि

पंख में फँसे बोझ कम हो जाएंगे
हिम्मत के धागे इसे वापस सिल पाएंगे। @surbhisays

वादे थे सबके साथ ना छोड़ने के ,

देखो आज आँसू ही हाल पूछते है ,

गूंजती धड़कने , सिसकती साँसें ,

देखो आज आँसू ही हाल पूछते है ,

जिसे चाहो , वही दूर हो जाता , और ऐसे मेरा आत्मविश्वास भी मुझसे कह जाता कि ,

“देखो आज आँसू ही हाल पूछते है , “

सवाल है दिल में

कि क्या खुशियाँ भी रहती नसीब के बिल में !

नम रहता सिरहाना मेरा ,

अंधेरे की बात है ,अंधेरे तक रहने देना ,

टूट चुके है हर ज़ज्बात मेरे ,

लेकिन हर बार

इन कांपते हाथों को थाम लेते

बुढ़ी माँ के प्यार के बसेरे । @surbhisays

जुनून – ए इश्क की क़ैफ़ियत पूछो ना हमसे ,

कि मझधार फसी भावनाओं की कश्ती ,

ज़लालत में डूब गई ! @surbhisays

इतना जुनूनी था प्यार मेरा कि ,

वफ़ादारी को गोद में पकड़े

चलते रहे और तोलते रहे ,

ताकि उन्हें ढूँढ , दिखा सके और पूछ सके कि

“यह वज़नी है या उनकी खूबसूरती !” @surbhisays

तैर रहे है सपने सुहाने , हवा में ,

किस्मत कहती पकड़ सको तो जाने !

बिखरते , टूटते , चारों ओर ,

आ गए नजरों की ओर ,

चुभा ऐसा , कोना-कोना

अंधकार जागा , आधा-पौना

अंधी आँखें , टूटा दिल ,

हँसते लोग , वाह! वाह ! इतने काबिल !

आत्मविश्वास दाव पर लगा है ,

किस्मत का ऐलान , ” यही तेरी सज़ा है ! “

अरे! गलती बिना सज़ा कैसे ?

सपने देखा… सब के जैसे !

बोली किस्मत,

“आयेगा वही पास जो सच्चा चाहता तेरा साथ,

समुंदर की नमकीन उम्मीदें , ना देती गिरते हलक को हाथ । ” @surbhisays

उधर लोगों की शर्तों में

सूरत और सीरत ,

दौड़ पड़े है मैदान में ,

इधर दिल चुनाव किए

इन्तेज़ार में

कि कब वह शर्तों का खेल बंद करेंगे और हमें ऐसे ही अपना लेंगे । @surbhisays

यूँ ना हवाले करो अपनी नजरों की गुफ़्तगू को ,

कि इल्ज़ाम हम पे लग जाए इश्क हो जाने का ,

घूँघट ओढ़े मुस्कान को ,

ऐसे न देखो ,

कि इल्ज़ाम हम पे लग जाए जज्बातों के ऐलान हो जाने का ,

लोग जो भी कहे , लेकिन

तेरे इस तीरंदाजी के खेल में जीतना ,

पता नहीं क्यूँ नजारा धुँधला कर देता है ,

इज़हार नहीं आता , बस कुछ गुमसुम एहसास है ,

एक तरफा ज़ज्बात है , लेकिन

इल्ज़ाम लग जाने का डर , पता नहीं क्यूँ अच्छा लगता है। @surbhisays

खोखला कर रहा ये अकेलापन,

घुट रहा , चीख रहा , ये अधूरापन !

सुनो ना , देखो ना… मेरी दस्तक अनसुनी क्यूँ है ?

मैं अनदेखी , बाकी सबकी खुशियाँ दुगुनी चौगुनी क्यूँ है ?

अंधेर बचपन …. डर का रास्ता था ,

आज अकेलापन … शायद यही वो दास्ताँ था ,

साथ की जरूरत , पुकारती है ,

जिंदगी के कांटे , मारती है ,

क्यूँ ? क्यूँ ? प्रश्नों का सैलाब … रुकता नहीं ,

मुझे पा के किसी को उत्सुकता नहीं । @surbhisays

प्रश्नोत्तर

चंदनिया तेरी आँख मिचौली ,

छुप क्यूँ रहा है वैसे ?

बोला “मेरे माथे की मौलि ,

झुक कर देखा जाए कैसे? “

डर का पहरा तेरे चेहरे ,

“गिरता ताज ठिठोली के मोहरे !”

गिर जाने दे , दो पल के प्रशंसक ,

अल्हड़ मन , होता हिंसक !

“वो देख दाग ,हँसी का पात्र,

ताज पहन , छुपता राज़ “

हो जा तन्हा , बेहतर होगा ,

दाग तेरा ताज ,

तभी “सराहना” की परिभाषा होगा ! @surbhisays

I can never fit in a definition of “perfect girl , “

wanted to be but my “kismet” a twirl !

Why our life dependent on fate ?

Stranded in its arm , no abate ..

Everyone found their “perfect” perfectly bind.

Am I invisible ? left behind !

Striving everyday …. hoping

To accept me as well ,expectations loading ..

Yes I can never fit in the definition of “perfect girl ” !

Letting people watch , I fit in the definition of “perfect pearl ” . @surbhisays