किराएदार है ये जिंदगी ,
वसूली की कर रही बंदगी ,
पायी-पायी के हिसाब को कहती दिल्लगी ,
खोखला कर हो जाती इसकी रवानगी !
टूटती कराहती सासें ,
अपनी मौजूदगी की नुमाइश करती ,
सपना देखती , अंतिम यात्रा और अर्थी !
पसीना और डर का घूंट ,
जज़्बातों की हो गई लूट!
भावनाएं दाव पर लगी है ,
ना जाने क्यूँ उम्मीदें इन्तेज़ार पे लगी है !
ये सब होने के बाद , साँसों ने मान लिया ,
कि लोगों को फर्क़ नहीं पड़ता किसी के फ़िक्र का ,
दिलों का मिलना बस एक ज़िक्र था ! @surbhisays
