यूँ ना हवाले करो अपनी नजरों की गुफ़्तगू को ,

कि इल्ज़ाम हम पे लग जाए इश्क हो जाने का ,

घूँघट ओढ़े मुस्कान को ,

ऐसे न देखो ,

कि इल्ज़ाम हम पे लग जाए जज्बातों के ऐलान हो जाने का ,

लोग जो भी कहे , लेकिन

तेरे इस तीरंदाजी के खेल में जीतना ,

पता नहीं क्यूँ नजारा धुँधला कर देता है ,

इज़हार नहीं आता , बस कुछ गुमसुम एहसास है ,

एक तरफा ज़ज्बात है , लेकिन

इल्ज़ाम लग जाने का डर , पता नहीं क्यूँ अच्छा लगता है। @surbhisays

प्रश्नोत्तर

चंदनिया तेरी आँख मिचौली ,

छुप क्यूँ रहा है वैसे ?

बोला “मेरे माथे की मौलि ,

झुक कर देखा जाए कैसे? “

डर का पहरा तेरे चेहरे ,

“गिरता ताज ठिठोली के मोहरे !”

गिर जाने दे , दो पल के प्रशंसक ,

अल्हड़ मन , होता हिंसक !

“वो देख दाग ,हँसी का पात्र,

ताज पहन , छुपता राज़ “

हो जा तन्हा , बेहतर होगा ,

दाग तेरा ताज ,

तभी “सराहना” की परिभाषा होगा ! @surbhisays

I can never fit in a definition of “perfect girl , “

wanted to be but my “kismet” a twirl !

Why our life dependent on fate ?

Stranded in its arm , no abate ..

Everyone found their “perfect” perfectly bind.

Am I invisible ? left behind !

Striving everyday …. hoping

To accept me as well ,expectations loading ..

Yes I can never fit in the definition of “perfect girl ” !

Letting people watch , I fit in the definition of “perfect pearl ” . @surbhisays

And this time again I am inches away ,

Tears , loneliness of which my heart weighs ,

Never knew growing up will be spine chilling ,

Where hatred , destestation hatches everyday killing !

What’s my mistake , my heart aches ,

Non – acceptance , mind quakes !

Why always me ?

Am I that bad for everyone to flee ?

I have lot to say ,

But unfortunately I’m inaudible , invisible… that’s my dismay !

Still ,

Waiting for one warm commitment ,

To hold this heart called fulfillment ,

To render the emotions like shipment

and feelings like a persistent . @surbhisays

हर कोशिशें नाकाम है ,

पता नहीं किस्मत का यह कौनसा मुकाम है !

धैर्य की सीमा टूट रही हैं,

भावनाओं की डोर छूट रही है ,

रिश्ता रखना कोई चाहता नहीं ,

सादगी परखना किसी को आता नहीं !

कसूर सिर्फ इतना है कि ,

अकेलापन मासूम सा साथ मांगता है ,

लेकिन दूसरों से अपनापन , अंधकार जागता है । @surbhisays

नहीं है वजूद मेरा किसी के सामने ,

करीब हो के भी कोई ना आता यह हाथ थामने ,

देखो मुझे , मैं भी हूँ यही मौजूद ,

दिखती क्यूँ नहीं मैं , दस्तक के बावजूद ?

खास है ना सब , मेरे अलावा ..

अकेला ही रह गया मेरा बुलावा !

रोता है दिल मेरा , बिना शोर के ,

अफसोस , तयारी है तेरी परायी खुशी की , जोर शोर से ,

काश ! कोई मेहसूस कर सकता इस दर्द के बहाव को ,

तोड़ कर रोक पाता , मेरी इस उलझन के घेराव को । @surbhisays

होता नहीं अपना कोई , सिर्फ कहने की बात है ,

साधारण को अपनाता न कोई , ऐसे ही हालात है ,

रात की आड़ में , आँखें दर्द कह लेती है ,

चीख-चीख कहती , ” यह जिंदगी बहुत दर्द देती है ”

गला घोंटता अकेलापन , बहुत दर्द देता है ,

ये हारा दिल , हर दिन ताने सेहता है

इस तरह आँसुओं का दर्द , मौन सा बहता है ,

बिखरा पड़ा है ज़ज्बात मेरा , साँसे भीख माँगती है ,

इन्तेज़ार है सिर्फ एक सम्मान का , मौत तक जिसे देख कांपती है । @surbhisays

अपनी खुशी की दुनिया में मुझे घुमाया नहीं ,
मेरे जज़्बातों को कभी अपनाया नहीं ,

तेरे दिल ने तारीफें कभी गिनाया नहीं ,
मैं अकेली , तूने रिश्ता कभी निभाया नहीं !

रोती रही लेकिन हमने जताया भी नहीं ,
कि एक जुड़ाव था , जो खो दिया , हँसता रहा तू , जरा सा पछताया भी नहीं ? @surbhisays

जाने के बाद , मुड़ के देखा ना कर ,

क्या पता ये भावनायें बेवफ़ा हो जाए ,
मुड़ के वापस से बिनती में लग जाए ।

यूँ अपनी नजरों में इज्ज़त बनाना , थकान देती ,
लेकिन जाने क्यूँ हर दिन पसीने की बूंद , मुस्कान देती  ।

ना देख मुड़ कर ,
  क्या पता ये भावनायें बेवफ़ा हो जाए ,
मुड़ के वापस से बिनती में लग जाए ,

हर एक बुनी यादें दर्द बहुत देती ,
लेकिन जाने क्यूँ हर एक ज़ख़्म का दर्द , सुकून देती ,

मुड़ के देखा ना कर ,

क्या पता ये भावनायें बेवफ़ा हो जाए ,
मुड़ के वापस से बिनती में लग जाए । @surbhisays

टूटा था वो काँच आदतों का ,

तब छुपा ना था कोई ऐसा कोना,

जिधर चुभा ना था , चाहतों का बोना ,

आँसुओं से लत पत , दौड़ता दर्द ,

घबराहट , उलझन , दुखों का ज़र्द ।

टूटा था वो काँच आदतों का

तब छुपा ना था कोई ऐसा कोना ,

जो समझा ना था , धोखे का होना ,

साँसों का उखाड़ना , गहरा ज़ख़्म ,

गिरती , टूटती भावनाओं , कोशिशें खत्म।

टूटा था वो काँच आदतों का ,

तब छुपा ना था कोई ऐसा कोना, 

जो स्वीकार लिया था वर्तमान , आखिरी बार रोना ,

गिर गया था समय के पांव में ,

मना लिया था रहना टिक -टिक की छांव में ।

टूटा था वो काँच आदतों का ,

तब छुपा ना था कोई ऐसा कोना । @surbhisays