निरंतर प्रयास मे रहती भावनायें , बोलने के ,

लेकिन निगल के रह जाती घूँट डर के ,

डर इस बात का कि

कहीं वो बुरा ना मान जाए ,

बुरा मान कहीं ख्वाब अधूरे ना कर जाए ,

ख्वाब अधूरे कर कहीं डर की जीत पूरी ना कर जाए !

समेट कर भावनायें दिल में दफन करना ही एक राह है ,

निकल गई तो , कफ़न में ढ़की , काँधे में लदी , उसकी कराह है !

कितनी जिद्दी है ये भावनायें!

मुझे कहती , ” चल एक प्रयास करते है , हिम्मत करो मिल के अभ्यास करते है ! “

“मान लो वह ये सुन , हमारा प्रस्ताव कबूल करले , कबूल कर हमसे प्यार से बर्ताव करले ! “

मुझसे हँसी रोकी ना गई , मेरा साथ दे , भावनायें मज़बूत होती गई !

मैंने कहा , ” दल- दल हो तुम भावना ! फाँस लेने की है तुम्हारी योजना ! “

यह सुन मुझसे कहती , ” सच्चा है प्यार तुम्हारा तो थोड़ा उनको भी दो व्यक्त करने का मौका , क्यूँकी साथ जल्दी काट देती कष्ट का रास्ता , यह प्यार की नौका ! ” @surbhisays

Leave a comment