शौक रखते थे हम आँखों की सुंदरता देखना का ,
पलके झपकते ही इन्तेज़ार करते थे , चार होने की स्थिरता का !
आँखें कुछ तो कह रही थी , अंदर ही अंदर सह रही थी !
बेसब्री से इन्तेज़ार हो रहा था ,
“अनदेखी” औज़ार वार कर रहा था !
बिलख-बिलख कर रो रही थी ,
बस मेरी ही आँखें यह कोलाहल पढ़ रही थी !
हँस कर मैंने उसका मजाक उड़ाया ,
“ड्रामा” बोल मेरी आँख , इस दर्द को हवा में फूँक आया !
समय ने ऐसा पलटा खाया ,
जब खुद की भीगी आँखों को कोई समेटने ना आया !
शौकिया मिजाज़ मेरा चकनाचूर हो गया ,
अजीब था यह शौक जो दर्द सिर्फ मजाक में सुनता ही रह गया !
भर रहे इस “शौक” का जुर्माना अभी तक ,
दिल टूट गया , लोगों ने छोड़ दिया , भरेंगे ऐसा हर्जाना कब तक !!
बहुत दर्द देती है ये आँखें ,
काश ! लफ़्ज़ों द्वारा बोल सकती , प्रायश्चित की दुआ , दिन और रातें ! @surbhisays