चंदनिया तेरी आँख मिचौली ,
छुप क्यूँ रहा है वैसे ?
बोला “मेरे माथे की मौलि ,
झुक कर देखा जाए कैसे? “
डर का पहरा तेरे चेहरे ,
“गिरता ताज ठिठोली के मोहरे !”
गिर जाने दे , दो पल के प्रशंसक ,
अल्हड़ मन , होता हिंसक !
“वो देख दाग ,हँसी का पात्र,
ताज पहन , छुपता राज़ “
हो जा तन्हा , बेहतर होगा ,
दाग तेरा ताज ,
तभी “सराहना” की परिभाषा होगा ! @surbhisays