यूँ ना हवाले करो अपनी नजरों की गुफ़्तगू को ,
कि इल्ज़ाम हम पे लग जाए इश्क हो जाने का ,
घूँघट ओढ़े मुस्कान को ,
ऐसे न देखो ,
कि इल्ज़ाम हम पे लग जाए जज्बातों के ऐलान हो जाने का ,
लोग जो भी कहे , लेकिन
तेरे इस तीरंदाजी के खेल में जीतना ,
पता नहीं क्यूँ नजारा धुँधला कर देता है ,
इज़हार नहीं आता , बस कुछ गुमसुम एहसास है ,
एक तरफा ज़ज्बात है , लेकिन
इल्ज़ाम लग जाने का डर , पता नहीं क्यूँ अच्छा लगता है। @surbhisays