जब जिंदगी कोफ़्त बन जाती है , तब हम “मैं ही क्यूँ ” का सवाल पूछने लग जाते है| जीने की आशा ही मर सी जाती है | लोगो की सांतवाना बहुत बेबस मेहसूस कराती है, कि क्या हम इतने असहाय हो गए हैं कि खुद को संभाल नहीं सकते? जिंदगी बहुत क्रूर हो गई है और हम लाचार से हो गए है| इस हद तक खोखला सा हो गया है कि एक छोटे से कीड़े के जाने पर आँसू आ जाते है| बस इन्तेज़ार है और विनती है जिंदगी से थोड़ा नर्म हो जाने की 🙏@surbhisays
सुरभि जी, आपने जीवन की उस अवस्था को बहुत सच्चाई और संवेदना के साथ व्यक्त किया है, जहाँ भीतर की थकान शब्दों में उतर आती है।
जब जीवन “कोफ़्त” बन जाता है, तब “मैं ही क्यों” का प्रश्न केवल शिकायत नहीं होता—वह भीतर के टूटते हुए संतुलन की आवाज़ होता है।
यह वही क्षण होता है, जब मन अपने ही बोझ से दबने लगता है और आशा की लौ धीमी पड़ जाती है। लोगों की सांत्वना कई बार सचमुच असहाय-सी लगती है, क्योंकि उस समय हमें शब्द नहीं, बल्कि भीतर से उठती हुई शक्ति की आवश्यकता होती है।
और जब आप कहते हैं कि एक छोटे से कीड़े के जाने पर भी आँसू आ जाते हैं तो यह आपकी कमजोरी नहीं, बल्कि आपके भीतर बची हुई संवेदनशीलता और जीवंतता का प्रमाण है।
सच तो यह है कि जो भीतर से पूरी तरह टूट जाता है, वह महसूस करना भी छोड़ देता है।
आप अभी भी महसूस कर रहे हैं; इसका अर्थ है कि जीवन अब भी आपके भीतर बह रहा है।
कभी-कभी जीवन कठोर नहीं होता,
वह हमें भीतर से नया गढ़ रहा होता है, बस उसकी प्रक्रिया थोड़ी कठोर लगती है।
आपकी यह विनती; “ज़िंदगी थोड़ा नर्म हो जाए”, बहुत मानवीय है।
पर शायद जीवन धीरे से कहता है:
“मैं नर्म हो जाऊँगा… जब आप अपने प्रति थोड़े कोमल हो जाएँगे।”
आप अकेले नहीं हैं,
यह दौर भी बीत जाएगा…
और जो संवेदनशीलता आज आपको रुला रही है,
वही कल आपको और गहराई से जीना सिखाएगी। 🙏
विजय श्रीवास्तव
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