मुलाकातें तो बहुत हुई है अधूरेपन से ,
लेकिन आज यह इतने पास ना जाने क्यूँ है !
एक अजीब सी उदासी ,
चेहरे पर ठहरी , पता नहीं क्यूँ है !
लोगों से दूर , सुनसान ,
फिर भी दिल में घमासान ,
ना जाने क्यूँ है !
बचपन का अकेलापन आज
अभी तक इसका साथ पता नहीं क्यूँ है !
डरी , घबराई ,सहमी
आज भी नज़रअंदाजी , ना जाने क्यूँ है !
टूटा बिखरा पड़ा आत्मविश्वास , पता नहीं क्यूँ है!
चुप , शांत , ये खामोशी ना जाने क्यूँ है ,
अगर है भी तो ,
इसे चिल्ला- चिल्ला के मदद ना मांग पाना
पता नहीं क्यूँ है। @surbhisays